Monday, October 25, 2010

योजनाएं बनाम ठंडा बस्ता

योजनाएं बनाम ठंडा बस्ता
एक होता है बस्ता और एक होता है ठंडा बस्ता। आपने बस्ते तो बहुत देखें होंगे लेकिन ठंडे बस्ते के बारे में केवल सुना होगा। या फिर महसूस किया होगा। हमारे देश में समुचित वज़न के आभाव में फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। और वो तभी बाहर आ पाती है। जब मुट्ठी गर्म हो जाती है या फिर सुविधा षुल्क का चढ़ावा चढ़ जाता है। यदि आप चाहते है कि आपकी फाइल ठंडे बस्ते का मुंह ना देखें तो फाइल प्रस्तुत करते ही मुंह दिखाई की रस्म अदा कर दीजिए। वरना आप जाने और आपका काम। ऐसा नहीं है कि सिर्फ चढ़ावे या कहें सुविधा शुल्क के अभाव में फाइलें ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती है। कुछ ऐसी भी योजनाएं है जिनसे फाइलें टेबल-दर- टेबल आगे बढ़ जाती है। यह योजना है जुगाड़ की। जिस तरह देश प्रदेश और राजनीतिक पार्टियों का प्रतीक होता है उसी तरह ठंडा बस्ता भी राजनेताओं और अफसरशाही का प्रतीक होता है। चुनावी रैलियों में नेता बड़े-बडे़ वादे करते है। बड़ी-बड़ी योजनाएं लाने की बात करते है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वादें और योजनाएं ठंडे बस्ते में। इसी तरह हर विभाग में ठंडा बस्ता होता है। जहां फाइलें साल-दर-साल धूल फांकती रहती है। बड़े अरमानों के साथ लोग निवेदन करते हैं आवेदन करते है। और लोगों के ये अरमानों के आवेदन ठंडे बस्ते में पहुंच कर बेदम हो जाते है।
हमारे देश में बड़े ही जोरशोर से योजनाएं बनती है। 2 फुट चौडे़ 3 फुट लंबे ग्रेनाइट के पत्थर पर सुनहरें अक्षरों में योजना और शिलान्यास करने वाले नेता का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाता है। लोगों में आशा बंधती है कि अब काम शुरू होगा। कुछ दिनों तक बड़े-बड़े अफसर सर्वे और काम कैसे होगा इसके लिए दौरे करते है। लेकिन योजनाओं को धरातल की वास्तविकता पर आने में सालों बीत जाते है। कभी धन के आभाव में तो कभी सरकारी हुकमरानों की उदासीनता के चलते और अगर इस बीच सत्ता परिवर्तन हो गई तो फिर उस योजना का भगवान ही मालिक है। ग्रेनाइट पत्थर पर लिखे सुनहरें अक्षर वक़्त के साथ काले पड़ जाते है। लेकिन काम ठंडे बस्ते से बाहर नहीं आ पाता।
कभी-कभी ये ठंडा बस्ता दुश्मनी निकालने के काम में भी आता है। यदि कोई सीधे आपसे नहीं भिड़ सकता तो वो आपकी फाइल अपने प्रबंध तंत्र सक्रिय कर ठंडे बस्ते में पहुंचा देता है। ठंडा बस्ता वो बिच्छू है जिसका कंाटा पानी भी नहीं मांगता। अभी-अभी तो जवानी के दिनों में गई फाइल तब बाहर आती है। जब आप अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर होते है। वैसे भी जब सूखे में पूरी फसल बर्बाद हो गई उसके बाद बरसें पानी का क्या काम। आज देश युवाओं का है। हर क्षेत्र में युवा आगे आ रहे है। वो कुछ करना चाहते है। लेकिन कुछ वरिष्ठ लोग उनके कामों में रोड़ा बन जाते है। युवा में जोश होता है। वो पहले दिन आफिस में आकर देखता है कि दो अधिकारियों के बीच में इतनी फाइलें इक्कट्ठा हो गई है। कि दीवार बन गई। वो इन फाइलों की बनी दीवार को गिराना चाहता है। कुछ दिनों तक एक दो ईट गिराता है। लेकिन दो चार महीने बीतने के बाद उसे भी आटे-दाल का भाव पता चल जाता है। वो देखता है कि एक ओर वो दीवार गिरा रहा है तो दूसरी ओर एक मजबूत दीवार खड़ी हो रही है। जिसकी चार दीवारी में रिटायर्ड होने तक काम करना है। ये हमारे देष की ऐसी व्यवस्था है जिससे हमें अपने जीवन में कई बार दो चार होना पड़ता है। हम चाहते है कि व्यवस्था में सुधार हो लेकिन कही ना कही इस व्यवस्था के लिए हम ही ज़िम्मेदार है क्योकि हम लोग ही है जो आपने काम को जल्दी पूरा कराने के लिए सुविधा षुल्क दे देते है। यानी अगर हम अपनी सोच बदलेंगे तो समाज की सोच अपने आप बदल जाएगी। महेश चतुर्वेदी

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