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Sunday, July 3, 2011
आज मेरी विदाई है ...........................
30 जून 2011 ये मेरी विदाई की तारीख है। आज के बाद लोग मुझे बीता हुआ कल कहेंगें। मैं कभी देष की अर्थव्यवस्था हुआ करती थी आज बीता हुआ कल हूं। अब लोग मुझे अपनी जेब में भी रखना पसंद नहीं करते। कभी मैं देष के नन्हे मुन्नों की षान थी। मैं बच्चों की सबसे प्यारी दोस्त थी। वो जो कुछ भी पाना चाहते थे मेरे बदले में पा लिया करते थे। मैं चवन्नी हूं। बात बहुत पहले की है जब मैं और लेखक गहरे दोस्त हुआ करते थे। वो हमेषा मुझे अपनी जेब में रखता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से हम दोनों साथ नहीं वज़ह है अब उसके नये दोस्त बन गए हैं। अब वो बड़े सिक्कों और रूपयों के साथ दोस्ती करता है। मेरे दोस्त की बड़े सिक्कों और रूपयों की चाहत में मैं बहुत पीछे छूट गयी। मुझे इस बात का जरा सा भी गम नहीं कि आज मैं और मेरा दोस्त साथ नहीं है। बस गम इस बात का है कि वो आज मेरी आखिरी विदाई पर दो आंसू तो दूर मेरे और उसके साथ बीते अतीत के पलों को भी याद नहीं कर रहा है। मुझे इस बात का गम नहीं कि आज मेरी आखिरी विदाई है। मुझे तो लोगों ने बहुत पहले ही अपनी जेबों से विदा कर दिया था। कभी मैं भगवान के दर की षोभा थी भगवान के भक्त मेरे साथ एक रूपये को मिला कर चढ़ावा चढ़ाते थे बीसआना। अब मेरी भी वहां जगह नहीं है। कभी मुझे लेकर इस देष के लोग अपनी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी किया करते थे। मैं देष की बड़े से बड़े कारोबारी की अहम जरूरत थी। कभी-कभी तो मुझ को ही लेकर बड़े-बड़े विवाद हो जाया करते थे। लेकिन वो सारी बातें मेरे लिए बेमानी हैं। जब मेरा दोस्त छोटा था तो स्कूल जाते समय अपनी मम्मी से मुझे मांगना नहीं भूलता था। वो स्कूल ले जाकर इंटरवल में मुझ से कभी टॉफी तो कभी लॉलीपॉप के मजे लिया करता था। षाम को क्रिकेट खेलने जाता और जब कभी गेंद खो जाती तो बच्चे मुझे मिलाकर नई गेंद ले आया करते थे। इस तरह हम दोनों एक दूसरे की बहुत बड़ी जरूरत थे। लेकिन जब वो थोड़ा बड़ा हुआ तो उसका एक और नया दोस्त बन गया मुझसे बड़ी अठन्नी। मेरा और मेरे दोस्त का साथ स्कूल तक ही रहा जब वह कालेज पढ़ने गया तब हम कभी कभार ही साथ हुआ करते थे। आज वो मुझे चाह कर भी नहीं पा सकता। कुछ सालों पहले वो एक प्राचीन मंदिर में देवी के दर्षन करने गया था। जहां पर केवल बीसआना ही चढ़ावे में चढ़ते है। तब मेरे दोस्त को मेरी कुछ पल के लिए याद आई। बड़ी मुष्किल से एक माली से उसने बड़े सिक्कों के बदले मुझे लिया था। ये हमारी आखिरी मुलाकात थी। इसके बाद हम कभी नहीं मिले। अब तो वो लोग भी मुझे अपने पास नहीं रखते जिन्हें समाज के लोग मुझे दान में दे दिया करते थे। वज़ह है आज मैं चलन में नहीं हूं। कोई दुकानदार, रिक्षेवाला, ऑटोवाला, नहीं लेता। बात बहुत लम्बी है सुनाऊंगा तो किताब भी कम पड़ जाएंगी। क्योकि कहीं ना कही मैं देष के हर आमो-खास के साथ जुड़ी रही हूं। मैं बेवज़ह विदा नहीं हो रही हूं। सरकार ने मुझे विदा करने की वज़ह बताई है मेरी लागत में लगने वाला पैसा सरकार कहती है कि जितनी मेरी कीमत है उससे ज्यादा मेरी लागत है। दोस्तों ये मेरा आखिरी सलाम है बस दोस्तों एक बात याद रखना जिस तरह आप अपने पुराने दोस्तों को कभी कभार याद कर लिया करते हो उसी तरह साल दो साल में मुझे जरूर याद कर लेने मैं समझूंगी कि आज भी हम साथ हैं। खुदा हाफ़िज...................
Sunday, April 3, 2011
मैं वानखेडे बोल रहा हूं......
आज मैं गवाह बन गया हूं उस इतिहास का जो सैकड़ों वर्षो तक दुनिया की आवाम की जुबान पर सुनाई देता रहेगा। मैं गवाह बन गया हूं उस सोच का जिसमें हौसला है अपने सपनों को साकार करने का। मैं गवाह हूं उस 121 करोड़ के सपनों का जिसने सोचा था कि मेरी पिच पर क्रिकेट के भगवान का सपना साकार हो जो वह पिछले 22 सालों से देख रहे थे। आखिरकार 28 साल बाद वो घंडी आ ही गई। मुंबई के अरब सागर के किनारे जब मुझे बनाया गया तब शायद ही मैंने या मुझे बनाने वालों ने सोचा होगा कि एक दिन मैं इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाऊंगा। तारीख 2 अप्रैल 2011 वो दिन था जब मैं इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया । आज मैं गवाह बना गया हूं उन लोगों की आंखों का जिन्होंने बड़ी चाह से यहां बैठ कर भारत श्रीलंका के बीच हुए ऐतिहासिक मैच को देखा। टीम इंडिया की जीत के साथ ही मानों देश की 121 करोड़ आवाम की सारी मन्नतें पूरी हो गई हो। उस रात ऐसा लग रहा था कि देश में आज सारे त्योहार एक साथ आ गये है। और लोग सोच नहीं पा रहे कि वो दिवाली मनाएं,दशहरा मनाएं, या फिर होली या ईद। देश में आज कोई त्योहार नहीं था लेकिन फिर भी लोग मिठाईयां बांट रहे थे पटाखें फोड़ रहे थे, अबीर गुलाल लगा रहे थे, गले मिल रहे थे। हो भी क्यो ना आज देश में सबसे बड़ा त्योहार जो था। धोनी की सेना ने 28 साल बाद भारत को वर्ल्ड कप की सौगात जो दी थी। टीम इंडिया के खिलाड़ी जब जीत के बाद सचिन को कंधों पर उठाकर मेरे चारों ओर चक्कर लगा रहे थे। तब मेरे बगल में अरब सागर की लहरें अचानक ऊपर उठने लगी मानों वो भी क्रिकेट के भगवान को अपने कंधों पर उठा लेना चाहती हो। टीम इंडिया की जीत के बाद सारा देश खुश था तो क्रिकेट के भगवान की आंखे नम थी। जाहिर है ये उस जीत के आंशू थे जिसका इंतजार सचिन की आंखे पिछले 22 सालों से कर रही थी।
Monday, January 3, 2011
भाई लोग कुछ तो सोचो .....
दिल्ली में पिछले दिनों पुस्तक मेला लगा जिसमें देष ही नहीं विदेषों के भी प्रकाषकों ने भाग लिया। लेकिन लोगों ने कितना भाग लिया इसका अंदाजा लगाना मुष्किल है। क्योकि लोगों को जितनी संख्या में पहुंचना था उतनी संख्या में नहीं पहुंचे। कुछ ने सर्दी को वज़ह बताया तो कुछ ने कहा कि क्या करेगें जाके। मेरे ही कुछ दोस्तों ने तो यहां तक कह दिया कि पागल है क्या बुक फेयर जाएगा। न्यू ईयर पर कही और घूम के आ। नया साल था तो मैंने सोचा साल भर छुट्टी के दिन तो कही ना कही घूमने जाता हू। लेकिन इस बार बुक फेयर ही जाऊगा। वहां पहुंच के लगा कि मेरे दोस्त आने के लिए क्यों मना कर रहे थे। मेले दिल्ली का वो यूथ गायब था जो ट्रेड फेयर के दौरान प्रगति मैदान में दिख रहा था। बुक फेयर में जो लोग पहुंचे थे उनमें से ज्यादातर अपने बच्चों के साथ घूमने आए थे। ऐसा नहीं है कि मेले में लोग केवल मौज मस्ती के लिए ही आए थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो पुस्तकों के इस मेले का भरपूर लाभ लेने के इरादे से यहां पहुंचे थे। क्योकि उन्हें मालूम है कि ये दिल्ली में साल में एक बार होने वाला पुस्तकों का महा कुंभ है। इस लिए वो इसमें डुबकी लगाने से भी नहीं चूकना चाहते। मेले में प्रकाषकों ने भी लोगों को लुभाने के लिए तरह-तरह के डिस्काउंट दे रखे थे। कोई दस फीसदी डिस्काउंट दे रहा था तो कोई 40-50 फीसदी तक का डिस्काउंट दे रहा था। लेकिन यहां का आलम देख कर बड़ा अजीब लगा। कि जो लोग पीज़ा,बर्गर और बड़े होटलों में डिस्कांउट और बिल नहीं देखते वो यहां 100 रूपये से भी कम कीमत की किताब पर डिस्कांउट देख रहे थे। षायद यही भारत की तस्वीर है कि अमीर के पास एैषो आरम के लिए तो पैसे है लेकिन ज्ञान की पुस्तकों के लिए पैसे नहीं है। लोग अपने बच्चों को आज डॉक्टर,इंजीनियर, और ना जाने क्या-क्या बनाना चाहते है। लेकिन लेखक नहीं बनाना चाहते। ये भी देष के एक विडंबना है। ये सवाल है खुद से हर उस इंसान से जिन्हें पुस्तकों से लगाव है। हर उस इंसान से जो किताबों को अपने बच्चे की तरह संभालकर रखते है। चलएि साहब किसी ने पुस्तक मेले का मजा लिया हो या ना लिया हो लेकिन मैंने एक बार फिर से कुंभ में स्नान कर लिया।
Sunday, December 12, 2010
क्यों जरूरी हैं उमा ?
उमा भारती एक ऐसा नाम जिसे लेने से पहले बीजेपी के आला नेता भी एक बार सोचते हैं । आखिर क्या वज़ह है कि बीजेपी के लिए उमा भारती जरूरी है। जब भी बीजेपी में उमा भारती की वापसी की सुगबुगाहट षुरू होती है। बीजेपी के कुछ नेता असहज होने लगते हैं। वज़ह है उमा भारती का अडियल रवैया। एक बार फिर से बीजेपी में उमा भारती की वापसी के लिए संभावनाएं तेज हो गई हैं। कहा जा रहा है कि पार्टी के सबसे वरिश्ठ नेता लाल कृश्ण आडवाणी ने उमा भारती की वापसी पर अपनी सहमति दे दी है। लेकिन साध्वी के भेश में राजनेता उमा भारती के बीजेपी में पुनर्प्रवेष की सम्भावनाओं पर पार्टी के भीतर ही आपस में तलवारें खिंच गई है। वर्तमान समय में बीजेपी का पद आसीन कोई भी नेता उमा की वापसी के मुद्दे पर सहमत नहीं है। लेकिन बीजेपी की क्या मजबूरी है कि वो बार-बार उमा की वापसी के लिए नए रास्ते तैयार कर रही है। क्या वज़ह है कि संघ तक उमा भारती के मुद्दे पर चुप्पी साध लेता है। मध्य प्रदेष की मुख्यमंत्री रह चुकी उमा भारती ने जब बीजेपी से बगावत कर अपनी पार्टी बनाई थी तब ऐसा लग रहा था कि बीजेपी को काफी नुकसान पहुंचाएंगी लेकिन तस्वीर एक दम उल्टी दिखी। उमा भारती ने ना तो बीजेपी को कोई नुकसान पहुंचाया और ना ही अपनी जमीन मजबूत कर पाई। बीजेपी से बाहर रहकर उन्होंने न केवल अपनी ताकत का ही आकलन कर लिया। बल्कि बीजेपी ने भी उनकी ताकत देख ली। कि साध्वी का जनाधार कितना है। बीजेपी से बगावत के बाद उमा भारती के साथ वहीं नेता और लोग दिखे थे जिन्हें या तो बीजेपी में कोई पद नहीं मिला था या फिर लोध जाति के लोग। उमा भारती लोध जाति से आती है। इस जाति का प्रभाव यूपी और एमपी के कुछ जिलों में है। यूपी में कल्याण सिंह को लोध जाति का सबसे बड़ा नेता माना जाता हैं। यही वज़ह है कि यूपी विधानसभा चुनावों में उमा भारती ने अपने उम्मीदवारों को चुनावी समर में नहीं उतारा था। यही हाल गुजरात चुनावों के दौरान भी हुआ था जब अपने उम्मीदवारों के फॉर्म जमा करवाने के बाद नाम वापस ले लिए थे। उमा भारती ने उस समय ये दलील दी थी कि ये फैसला उन्होंने अपने गुरू की आज्ञा के बाद लिया था। लेकिन वास्तव में उमा भारती को मध्य प्रदेष के नतीजे याद थे। वो नहीं चाहती थी कि गुजरात चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े कर वो बीजेपी में वापसी के सारे रास्ते बंद कर लें। इस समय एक बार फिर से उमा भारती और आडवाणी नजदीक आ रहे है। ऐसे कयास लगाएं जा रहे है कि पार्टी उन्हें यूपी विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की कमान सौंप सकती है। पार्टी उमा भारती की वापसी से एक तीर से दो निषाने लगाना चाहती है एक तो पार्टी में लाल कृश्ण आडवाणी की सबसे करीब उमा भारती की वापसी और दूसरा पष्चिमी उत्तर प्रदेष में कल्याण सिंह के लोध वोट बैंक में सेंध लगाना। लेकिन उमा भारती की वापसी की ख़बरों से बीजेपी के कई नेता असहज हो गए है। बहरहाल उमा भारती बीजेपी में आने को तैयार है लेकिन सही वक़्त के लिए अभी पार्टी इंतजार में है।
Monday, October 25, 2010
योजनाएं बनाम ठंडा बस्ता
योजनाएं बनाम ठंडा बस्ता
एक होता है बस्ता और एक होता है ठंडा बस्ता। आपने बस्ते तो बहुत देखें होंगे लेकिन ठंडे बस्ते के बारे में केवल सुना होगा। या फिर महसूस किया होगा। हमारे देश में समुचित वज़न के आभाव में फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। और वो तभी बाहर आ पाती है। जब मुट्ठी गर्म हो जाती है या फिर सुविधा षुल्क का चढ़ावा चढ़ जाता है। यदि आप चाहते है कि आपकी फाइल ठंडे बस्ते का मुंह ना देखें तो फाइल प्रस्तुत करते ही मुंह दिखाई की रस्म अदा कर दीजिए। वरना आप जाने और आपका काम। ऐसा नहीं है कि सिर्फ चढ़ावे या कहें सुविधा शुल्क के अभाव में फाइलें ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती है। कुछ ऐसी भी योजनाएं है जिनसे फाइलें टेबल-दर- टेबल आगे बढ़ जाती है। यह योजना है जुगाड़ की। जिस तरह देश प्रदेश और राजनीतिक पार्टियों का प्रतीक होता है उसी तरह ठंडा बस्ता भी राजनेताओं और अफसरशाही का प्रतीक होता है। चुनावी रैलियों में नेता बड़े-बडे़ वादे करते है। बड़ी-बड़ी योजनाएं लाने की बात करते है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वादें और योजनाएं ठंडे बस्ते में। इसी तरह हर विभाग में ठंडा बस्ता होता है। जहां फाइलें साल-दर-साल धूल फांकती रहती है। बड़े अरमानों के साथ लोग निवेदन करते हैं आवेदन करते है। और लोगों के ये अरमानों के आवेदन ठंडे बस्ते में पहुंच कर बेदम हो जाते है।
हमारे देश में बड़े ही जोरशोर से योजनाएं बनती है। 2 फुट चौडे़ 3 फुट लंबे ग्रेनाइट के पत्थर पर सुनहरें अक्षरों में योजना और शिलान्यास करने वाले नेता का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाता है। लोगों में आशा बंधती है कि अब काम शुरू होगा। कुछ दिनों तक बड़े-बड़े अफसर सर्वे और काम कैसे होगा इसके लिए दौरे करते है। लेकिन योजनाओं को धरातल की वास्तविकता पर आने में सालों बीत जाते है। कभी धन के आभाव में तो कभी सरकारी हुकमरानों की उदासीनता के चलते और अगर इस बीच सत्ता परिवर्तन हो गई तो फिर उस योजना का भगवान ही मालिक है। ग्रेनाइट पत्थर पर लिखे सुनहरें अक्षर वक़्त के साथ काले पड़ जाते है। लेकिन काम ठंडे बस्ते से बाहर नहीं आ पाता।
कभी-कभी ये ठंडा बस्ता दुश्मनी निकालने के काम में भी आता है। यदि कोई सीधे आपसे नहीं भिड़ सकता तो वो आपकी फाइल अपने प्रबंध तंत्र सक्रिय कर ठंडे बस्ते में पहुंचा देता है। ठंडा बस्ता वो बिच्छू है जिसका कंाटा पानी भी नहीं मांगता। अभी-अभी तो जवानी के दिनों में गई फाइल तब बाहर आती है। जब आप अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर होते है। वैसे भी जब सूखे में पूरी फसल बर्बाद हो गई उसके बाद बरसें पानी का क्या काम। आज देश युवाओं का है। हर क्षेत्र में युवा आगे आ रहे है। वो कुछ करना चाहते है। लेकिन कुछ वरिष्ठ लोग उनके कामों में रोड़ा बन जाते है। युवा में जोश होता है। वो पहले दिन आफिस में आकर देखता है कि दो अधिकारियों के बीच में इतनी फाइलें इक्कट्ठा हो गई है। कि दीवार बन गई। वो इन फाइलों की बनी दीवार को गिराना चाहता है। कुछ दिनों तक एक दो ईट गिराता है। लेकिन दो चार महीने बीतने के बाद उसे भी आटे-दाल का भाव पता चल जाता है। वो देखता है कि एक ओर वो दीवार गिरा रहा है तो दूसरी ओर एक मजबूत दीवार खड़ी हो रही है। जिसकी चार दीवारी में रिटायर्ड होने तक काम करना है। ये हमारे देष की ऐसी व्यवस्था है जिससे हमें अपने जीवन में कई बार दो चार होना पड़ता है। हम चाहते है कि व्यवस्था में सुधार हो लेकिन कही ना कही इस व्यवस्था के लिए हम ही ज़िम्मेदार है क्योकि हम लोग ही है जो आपने काम को जल्दी पूरा कराने के लिए सुविधा षुल्क दे देते है। यानी अगर हम अपनी सोच बदलेंगे तो समाज की सोच अपने आप बदल जाएगी। महेश चतुर्वेदी
एक होता है बस्ता और एक होता है ठंडा बस्ता। आपने बस्ते तो बहुत देखें होंगे लेकिन ठंडे बस्ते के बारे में केवल सुना होगा। या फिर महसूस किया होगा। हमारे देश में समुचित वज़न के आभाव में फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। और वो तभी बाहर आ पाती है। जब मुट्ठी गर्म हो जाती है या फिर सुविधा षुल्क का चढ़ावा चढ़ जाता है। यदि आप चाहते है कि आपकी फाइल ठंडे बस्ते का मुंह ना देखें तो फाइल प्रस्तुत करते ही मुंह दिखाई की रस्म अदा कर दीजिए। वरना आप जाने और आपका काम। ऐसा नहीं है कि सिर्फ चढ़ावे या कहें सुविधा शुल्क के अभाव में फाइलें ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती है। कुछ ऐसी भी योजनाएं है जिनसे फाइलें टेबल-दर- टेबल आगे बढ़ जाती है। यह योजना है जुगाड़ की। जिस तरह देश प्रदेश और राजनीतिक पार्टियों का प्रतीक होता है उसी तरह ठंडा बस्ता भी राजनेताओं और अफसरशाही का प्रतीक होता है। चुनावी रैलियों में नेता बड़े-बडे़ वादे करते है। बड़ी-बड़ी योजनाएं लाने की बात करते है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वादें और योजनाएं ठंडे बस्ते में। इसी तरह हर विभाग में ठंडा बस्ता होता है। जहां फाइलें साल-दर-साल धूल फांकती रहती है। बड़े अरमानों के साथ लोग निवेदन करते हैं आवेदन करते है। और लोगों के ये अरमानों के आवेदन ठंडे बस्ते में पहुंच कर बेदम हो जाते है।
हमारे देश में बड़े ही जोरशोर से योजनाएं बनती है। 2 फुट चौडे़ 3 फुट लंबे ग्रेनाइट के पत्थर पर सुनहरें अक्षरों में योजना और शिलान्यास करने वाले नेता का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाता है। लोगों में आशा बंधती है कि अब काम शुरू होगा। कुछ दिनों तक बड़े-बड़े अफसर सर्वे और काम कैसे होगा इसके लिए दौरे करते है। लेकिन योजनाओं को धरातल की वास्तविकता पर आने में सालों बीत जाते है। कभी धन के आभाव में तो कभी सरकारी हुकमरानों की उदासीनता के चलते और अगर इस बीच सत्ता परिवर्तन हो गई तो फिर उस योजना का भगवान ही मालिक है। ग्रेनाइट पत्थर पर लिखे सुनहरें अक्षर वक़्त के साथ काले पड़ जाते है। लेकिन काम ठंडे बस्ते से बाहर नहीं आ पाता।
कभी-कभी ये ठंडा बस्ता दुश्मनी निकालने के काम में भी आता है। यदि कोई सीधे आपसे नहीं भिड़ सकता तो वो आपकी फाइल अपने प्रबंध तंत्र सक्रिय कर ठंडे बस्ते में पहुंचा देता है। ठंडा बस्ता वो बिच्छू है जिसका कंाटा पानी भी नहीं मांगता। अभी-अभी तो जवानी के दिनों में गई फाइल तब बाहर आती है। जब आप अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर होते है। वैसे भी जब सूखे में पूरी फसल बर्बाद हो गई उसके बाद बरसें पानी का क्या काम। आज देश युवाओं का है। हर क्षेत्र में युवा आगे आ रहे है। वो कुछ करना चाहते है। लेकिन कुछ वरिष्ठ लोग उनके कामों में रोड़ा बन जाते है। युवा में जोश होता है। वो पहले दिन आफिस में आकर देखता है कि दो अधिकारियों के बीच में इतनी फाइलें इक्कट्ठा हो गई है। कि दीवार बन गई। वो इन फाइलों की बनी दीवार को गिराना चाहता है। कुछ दिनों तक एक दो ईट गिराता है। लेकिन दो चार महीने बीतने के बाद उसे भी आटे-दाल का भाव पता चल जाता है। वो देखता है कि एक ओर वो दीवार गिरा रहा है तो दूसरी ओर एक मजबूत दीवार खड़ी हो रही है। जिसकी चार दीवारी में रिटायर्ड होने तक काम करना है। ये हमारे देष की ऐसी व्यवस्था है जिससे हमें अपने जीवन में कई बार दो चार होना पड़ता है। हम चाहते है कि व्यवस्था में सुधार हो लेकिन कही ना कही इस व्यवस्था के लिए हम ही ज़िम्मेदार है क्योकि हम लोग ही है जो आपने काम को जल्दी पूरा कराने के लिए सुविधा षुल्क दे देते है। यानी अगर हम अपनी सोच बदलेंगे तो समाज की सोच अपने आप बदल जाएगी। महेश चतुर्वेदी
नफे-नुकसान के तराजू पर जाति
नफे-नुकसान के तराजू पर जाति
हमारे आसपास की दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। अमूमन इसका अहसास हमें तभी होता है। जब हम कुछ अरसे बाद किसी पुरानी जगह पर जाते है। आज के वक़्त में गांव के भौगोलिक स्थिति में खास अंतर नहीं आया था। और न ही उस पूरे क्षेत्र की आर्थिक या सामाजिक स्थितियों में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा था। पक्की चौड़ी सड़क ने जरूर इस गांवों को आसपास के दूसरे गांवों से जोड़ दिया है लेकिन यहां आज भी ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने है। मगर जो बदलाव इस दौरान इस गांव में आए। वो है लोगों की सोच। देष में हर दस साल में होने वाली जनगणना के गले में इस बार फिर जाति की फांस अटक गई है। जनगणना में जाति को षामिल करने की मांग आज से दस साल पहले 2001 में जनगणना षुरू होने से पहले भी उठी थी। पर तब इस मांग को बिना किसी सुविधा के खारिज कर दिया गया था और उस पर कोई खास राजनीतिक प्रतिक्रिया भी नहीं हुई थी। इस बार मामला कुछ अलग है।
जाति के तरफदारः इस बार जनगणना के साथ राश्ट्रीय पापुलेषन रजिस्टर भी बनाया जा रहा है। इसके आधार पर हर नागरिक को परमानेंट आइडेंटीफिकेषन मिलेगा। यानी जिसकी जो पहचान होगी। वह कुछ दिनों के लिए दस्तावेज बंद होकर तय हो जाएगी। इसीलिए दस साल पहले जो मांग अधिकतर पिछड़ा वर्ग कमिषनों की सिफारिषों और जनसंख्यिकी के कुछ विद्वानों की मार्फत कमजोर स्वरों में की गई थी। इस बार उसे पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाली पार्टियां जोरषोर से उठा रही है। यहां तक कि बीजेपी जैसे राश्ट्रीय दल ने भी इसके पक्ष में है। यूपीए सरकार के भीतर भी जाति और जनगणना को जोड़ने के तरफदार मौजूद है। और उनके दबाव के कारण इसके खिलाफ फैसला लेना सरकार के लिए आसान नहीं है। सवाल यह है कि अपनी संख्या कौन जानना चाहता है। केवल यही जिसे संख्या बल के आधार पर किसी तरह के फायदे की उम्मीद हो। भारतीय लोकतंत्र के संस्थापकों को यह अहसास था। इसीलिए षुरू से ही उनकी नीति संख्या के महत्व को एक हद से ज्यादा न बढ़ने देने की थी। उन्होनें संख्याओं का इस्तेमाल किया,पर पारंपरिक पहचानों के सेक्युलरीकरण के लिए। 1939 के बाद भारत की जनगणनाओं में जाति का उल्लेख करना बंद कर दिया गया था। आजादी के बाद यह परंपरा बदले हुए परिप्रेक्ष्य में जारी रखी गई। चूंकि संविधान निर्माताओं ने पूर्व-अछूतों और आदिवासियों की विषेश स्थितियों के मदद्ेनजर उन्हें उनकी जनसंख्या के मुताबिक राजनीतिक आरक्षण देने का फैसला किया था। इसलिए जनगणना में केवल उनकी संख्या का जिक्र किया गया।
राजनीति का आरक्षण........
संविधान पिछड़ी जातियों को राजनीतिक आरक्षण देने के पक्ष में नहीं था। वह उन्हें सिर्फ नौकरियों और स्कूल-कॉलेजों में आरक्षण देना चाहता था। उसके लिए गिनती की बजाय षैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन को आधार बनाना ही काफी था। इसलिए पिछड़ी जातियों को जनगणना में षामिल करने की जरूरत नहीं समझी गई। आरक्षण,जाति और जनगणना के इस व्यावहारिक त्रिकोण को अपनाने के पीछे जो दूरंदेषी थी। उसकी कामयाबी आज आसानी से देखी जा सकती है। इस सफलता के तीन पहलू है। पहला सरकारी लाभों को बांटने के मकसद से इसके आधार पर जातियों की पारंपरिक पहचान अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी सेक्युलर श्रेणियों में बदलने की प्रक्रिया षुरू हुई। दूसरा पिछड़ी जातियों ने चुनावी राजनीति के माध्यम से अपने संख्या बल को आधार बना कर आरक्षण प्राप्त किए बिना विधायिकाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल कर लिया। और साथ में उन्हें नौकरियों और षिक्षा संस्थानों में भी आरक्षण मिल गया। पिछड़ों को आगे बढ़ने के लिए न अब जरूरत थी और न अब अपनी गिनती जानने की जरूरत है। तीसरा आरक्षण के दायरे में न आने वाली अगड़ी जातियां खुले दायरे में आधुनिक षिक्षा और बाजार के जरिए मिलने वाले अवसरों के माध्यम से सेक्युलरीकरण के दौर से गुजरीं। वे वैसे ही संख्या में बहुत कम है। इसलिए उन्हें अपनी संख्या जानने की उत्सुक्ता बहुत कम होती है। यहां यह सवाल पूछना जायज है कि अगर जनगणना में हर नागरिक की जाति का जिक्र किया जाता। तो उसके क्या परिणाम निकलते। उसका पहला नतीजा यह निकलता कि आजादी के बाद समाज में राजनीति और बाजार के जरिए सामाजिक ऊंच-नीच की भावना में अब तक जो कमी आई है। वह काम नहीं हो पाता। दूसरे जिस परिघटना को अभी हम वोट बैंक कहते है। वह एक मोटी-मोटी अवधारणा ही है। दरअसल व्यावहारिक अर्थ में किसी जाति का वोट बैंक मौजूद नहीं है। चुनावी आंकड़े बताते है। कि जातियों का वोट एक पार्टी को कुछ ज्यादा मिलता है। पर बाकी वोट विविध कारणों से बंट जाते है। अगर सभी नागरिकों से जनगणना के दौरान उनकी जाति पूछी जाती तो हमारी राजनीति को असल में वोट बैंक का स्वाद पता चलता। तीसरे गिनती में जुड़े हुए मौजूदा फायदों को उठाने के लिए तो लोग अपनी जातियों को बदल कर पेष तो करते ही उनकी संख्या का अहसास ही उन्हें फायदों की राजनीति करने के लिए उकसाता। आज उनके पास निष्चित संख्याएं नहीं है। इसलिए ऐसी मांगो को नजरअंदाज किया जा सकता है। मसलन महिला आरक्षण विधेयक में पिछड़ी जातियों का कोटा षामिल करने की मांग को ठुकराना तब नामुमकिन हो जाता और संविधान की भावना का उल्लंधन करते हुए। स्त्रियों के नाम पर पिछड़ी जातियों द्वारा राजनीतिक आरक्षण हड़पने की संभावना बढ़
महेश चतुर्वेदी
हमारे आसपास की दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। अमूमन इसका अहसास हमें तभी होता है। जब हम कुछ अरसे बाद किसी पुरानी जगह पर जाते है। आज के वक़्त में गांव के भौगोलिक स्थिति में खास अंतर नहीं आया था। और न ही उस पूरे क्षेत्र की आर्थिक या सामाजिक स्थितियों में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा था। पक्की चौड़ी सड़क ने जरूर इस गांवों को आसपास के दूसरे गांवों से जोड़ दिया है लेकिन यहां आज भी ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने है। मगर जो बदलाव इस दौरान इस गांव में आए। वो है लोगों की सोच। देष में हर दस साल में होने वाली जनगणना के गले में इस बार फिर जाति की फांस अटक गई है। जनगणना में जाति को षामिल करने की मांग आज से दस साल पहले 2001 में जनगणना षुरू होने से पहले भी उठी थी। पर तब इस मांग को बिना किसी सुविधा के खारिज कर दिया गया था और उस पर कोई खास राजनीतिक प्रतिक्रिया भी नहीं हुई थी। इस बार मामला कुछ अलग है।
जाति के तरफदारः इस बार जनगणना के साथ राश्ट्रीय पापुलेषन रजिस्टर भी बनाया जा रहा है। इसके आधार पर हर नागरिक को परमानेंट आइडेंटीफिकेषन मिलेगा। यानी जिसकी जो पहचान होगी। वह कुछ दिनों के लिए दस्तावेज बंद होकर तय हो जाएगी। इसीलिए दस साल पहले जो मांग अधिकतर पिछड़ा वर्ग कमिषनों की सिफारिषों और जनसंख्यिकी के कुछ विद्वानों की मार्फत कमजोर स्वरों में की गई थी। इस बार उसे पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाली पार्टियां जोरषोर से उठा रही है। यहां तक कि बीजेपी जैसे राश्ट्रीय दल ने भी इसके पक्ष में है। यूपीए सरकार के भीतर भी जाति और जनगणना को जोड़ने के तरफदार मौजूद है। और उनके दबाव के कारण इसके खिलाफ फैसला लेना सरकार के लिए आसान नहीं है। सवाल यह है कि अपनी संख्या कौन जानना चाहता है। केवल यही जिसे संख्या बल के आधार पर किसी तरह के फायदे की उम्मीद हो। भारतीय लोकतंत्र के संस्थापकों को यह अहसास था। इसीलिए षुरू से ही उनकी नीति संख्या के महत्व को एक हद से ज्यादा न बढ़ने देने की थी। उन्होनें संख्याओं का इस्तेमाल किया,पर पारंपरिक पहचानों के सेक्युलरीकरण के लिए। 1939 के बाद भारत की जनगणनाओं में जाति का उल्लेख करना बंद कर दिया गया था। आजादी के बाद यह परंपरा बदले हुए परिप्रेक्ष्य में जारी रखी गई। चूंकि संविधान निर्माताओं ने पूर्व-अछूतों और आदिवासियों की विषेश स्थितियों के मदद्ेनजर उन्हें उनकी जनसंख्या के मुताबिक राजनीतिक आरक्षण देने का फैसला किया था। इसलिए जनगणना में केवल उनकी संख्या का जिक्र किया गया।
राजनीति का आरक्षण........
संविधान पिछड़ी जातियों को राजनीतिक आरक्षण देने के पक्ष में नहीं था। वह उन्हें सिर्फ नौकरियों और स्कूल-कॉलेजों में आरक्षण देना चाहता था। उसके लिए गिनती की बजाय षैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन को आधार बनाना ही काफी था। इसलिए पिछड़ी जातियों को जनगणना में षामिल करने की जरूरत नहीं समझी गई। आरक्षण,जाति और जनगणना के इस व्यावहारिक त्रिकोण को अपनाने के पीछे जो दूरंदेषी थी। उसकी कामयाबी आज आसानी से देखी जा सकती है। इस सफलता के तीन पहलू है। पहला सरकारी लाभों को बांटने के मकसद से इसके आधार पर जातियों की पारंपरिक पहचान अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी सेक्युलर श्रेणियों में बदलने की प्रक्रिया षुरू हुई। दूसरा पिछड़ी जातियों ने चुनावी राजनीति के माध्यम से अपने संख्या बल को आधार बना कर आरक्षण प्राप्त किए बिना विधायिकाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल कर लिया। और साथ में उन्हें नौकरियों और षिक्षा संस्थानों में भी आरक्षण मिल गया। पिछड़ों को आगे बढ़ने के लिए न अब जरूरत थी और न अब अपनी गिनती जानने की जरूरत है। तीसरा आरक्षण के दायरे में न आने वाली अगड़ी जातियां खुले दायरे में आधुनिक षिक्षा और बाजार के जरिए मिलने वाले अवसरों के माध्यम से सेक्युलरीकरण के दौर से गुजरीं। वे वैसे ही संख्या में बहुत कम है। इसलिए उन्हें अपनी संख्या जानने की उत्सुक्ता बहुत कम होती है। यहां यह सवाल पूछना जायज है कि अगर जनगणना में हर नागरिक की जाति का जिक्र किया जाता। तो उसके क्या परिणाम निकलते। उसका पहला नतीजा यह निकलता कि आजादी के बाद समाज में राजनीति और बाजार के जरिए सामाजिक ऊंच-नीच की भावना में अब तक जो कमी आई है। वह काम नहीं हो पाता। दूसरे जिस परिघटना को अभी हम वोट बैंक कहते है। वह एक मोटी-मोटी अवधारणा ही है। दरअसल व्यावहारिक अर्थ में किसी जाति का वोट बैंक मौजूद नहीं है। चुनावी आंकड़े बताते है। कि जातियों का वोट एक पार्टी को कुछ ज्यादा मिलता है। पर बाकी वोट विविध कारणों से बंट जाते है। अगर सभी नागरिकों से जनगणना के दौरान उनकी जाति पूछी जाती तो हमारी राजनीति को असल में वोट बैंक का स्वाद पता चलता। तीसरे गिनती में जुड़े हुए मौजूदा फायदों को उठाने के लिए तो लोग अपनी जातियों को बदल कर पेष तो करते ही उनकी संख्या का अहसास ही उन्हें फायदों की राजनीति करने के लिए उकसाता। आज उनके पास निष्चित संख्याएं नहीं है। इसलिए ऐसी मांगो को नजरअंदाज किया जा सकता है। मसलन महिला आरक्षण विधेयक में पिछड़ी जातियों का कोटा षामिल करने की मांग को ठुकराना तब नामुमकिन हो जाता और संविधान की भावना का उल्लंधन करते हुए। स्त्रियों के नाम पर पिछड़ी जातियों द्वारा राजनीतिक आरक्षण हड़पने की संभावना बढ़
महेश चतुर्वेदी
Monday, June 14, 2010
बीजेपी का ब्रम्हार्स्त है मोदी
पटना के गाँधी मैदान में बीजेपी ने विधान सभा चुनाव से पहले शक्ति प्रदर्शन कर अपनी ताकत को दिखा दिया। बीजेपी की ये रैली जनता दल (यू ) के लिए काफी नुकसान दायक हो सकती है। इस लिए रैली से पहलेही नितीश बाबु मोदी के साथ फोटो छपने पर आग बबूला हो गए। आलम ये था की नितीश ने कानूनी करवाई की धमकी तक दे डाली। १३ जून को नरेन्द्र मोदी जैसे ही स्वाभिमान रैली को संबोधित करने के लिए उठे तो गाँधी मैदान का नज़ारा मोदी मैहो गया। हर तरफ से मोदी की जय जय कर की आवाज़े आ रही थी। मोदी ने जैसे ही बोलना शुरु किया मानो कई महीनो से गर्त से समाई बीजेपी को नईजान मिल गयी हो। मोदी एक बार फिर अपने चित परचित अंदाज़ में दिखे। मोदी ने आतंकवाद, नक्सलवाद , महगाई , और भोपाल गैस त्रासदी के लिए कांग्रेस को सीधे जिम्मे दर बताया । मोदी ने सोनिया गाँधी से उन्ही शब्दों में जवाब मागा जिन शब्दों में सोनिया ने लोक सभा चुनाव के दौरान मोदी से गोधरा कांड के लिए जवाब मागा था। मोदी ने सोनिया से पूछा की भोपाल गैस कांड के दोषियों को भगाने वाला कौन है? मोदी के ये सवाल बीजेपी के लिए प्राण वायु बन गए । जो बीजेपी मुद्दों के विहीन थी उसे अचानक मुद्दा मिल गया। मोदी के ये बाण कांग्रेस के लिए बहुत घातक साबित हुए। इतना ही नहीं मोदी के भाषण के कुछ देर बाद सारे राजनीतिक दलों के नेता टीवी पर बयां देते नज़र आये। साफ है की बीजेपी के प्रमुख नेता जब बोलते है तो सब चुप रहते है लेकिन जब मोदी बोलते है तो सब मैदान में उतर आते है। जाहिर है की मोदी का कद बीजेपी के नेता से भी बड़ा हो गया है। इस लिए जब मोदी बोलते है तो राजनीतिक दलों के कान खड़े हो जाते है....... आखिर मोदी तो मोदी है भाई ..............
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